तेरी आंखों की चमक, तेरी होठों की मुस्कान सब खो चुकी है।

तेरी आंखों की चमक, तेरी होठों की मुस्कान सब खो चुकी है।
तेरे बोलने का अंदाज ,तेरी हंसी की मिठास अब लुट चुकी है।
तू बिखर गया है ,तू अकेला सा हो गया है
तू बिखर गया है ,तू अकेला सा हो गया है
ना तू सुनता है, ना तो सुनाना चाहता है।।
तू अकेले में रोता है ,तू दीवारों को ताक ता हैं।
तू दिन भर यही सोचता है -“मैं ही क्यों ?”
तू दिन भर यही सोचता है- “आखिर में ,मैं ही क्यों ?

Click picture …To read whole poem

Advertisements